प्लास्टिक नहीं, परंपरा में पैक हो रही पश्मीना, जर्मनी तक पहुंची पहाड़ की पहचान
खटीमा न्यूज़। संदीप पांडेय (राजतंत्र टाइम्स) जब किसी उत्पाद में परंपरा, प्रकृति और महिला शक्ति एक साथ जुड़ जाए, तो वह सिर्फ व्यापार नहीं रहता—वह पहचान बन जाता है। अल्मोड़ा की प्रसिद्ध पश्मीना शालें अब उसी पहचान के साथ दुनिया के बाजारों में कदम रख रही हैं। फर्क बस इतना है कि अब ये शालें प्लास्टिक या कार्डबोर्ड में नहीं, बल्कि खटीमा की महिलाओं द्वारा तैयार किए गए पारंपरिक मूंज घास के हस्तनिर्मित बॉक्स में सजकर विदेशों तक पहुंच रही हैं। यह अनोखी पैकेजिंग केवल शाल को सुरक्षित नहीं रखती, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, हस्तकला और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दुनिया तक पहुंचा रही है।
खटीमा की मूंज घास बनी रोजगार की रीढ़
राष्ट्रीय आजीविका मिशन और रीप योजना के अंतर्गत खटीमा विकास खंड में संचालित श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहौनिया मूंज घास ग्रोथ सेंटर आज महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यहां मूंज की घास से करीब 25 प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
इस क्लस्टर से जुड़े आसपास के गांवों की लगभग 1300 महिलाएं टोकरी, बॉक्स, सजावटी सामग्री और पारंपरिक पैकेजिंग उत्पाद बनाकर अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ मजबूत कर रही हैं। कुछ समय पहले ग्रोथ सेंटर को एक लाख रुपये मूल्य के मूंज बॉक्स का ऑर्डर मिला, जिसे पूरा करने के लिए महिलाएं दिन-रात जुटी हुई हैं।
पश्मीना की कीमत बढ़ी, पहचान और सम्मान भी
अल्मोड़ा की हस्तनिर्मित पश्मीना शालें पहले ही अपनी गुणवत्ता और बारीक कारीगरी के लिए जानी जाती थीं। लेकिन जब इन्हें मूंज घास के प्राकृतिक और हस्तनिर्मित बॉक्स में पैक किया गया, तो इनकी बाजार कीमत में भी इजाफा हुआ।
इन शालों का निर्यात अब जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों में किया जा रहा है। विदेशी ग्राहक पारंपरिक पैकेजिंग को “इको-फ्रेंडली लग्ज़री” के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि मूंज के बॉक्स में सजी पश्मीना अब सिर्फ वस्त्र नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और सतत विकास का प्रतीक बन चुकी है।
प्लास्टिक से दूरी, प्रकृति से दोस्ती
आज जब पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रही है, तब उत्तराखंड की यह पहल एक मिसाल बनकर उभरी है। मूंज घास पूरी तरह प्राकृतिक, बायोडिग्रेडेबल और स्थानीय संसाधन है। इससे बने बॉक्स न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि पारंपरिक हस्तशिल्प को जीवित भी रख रहे हैं। वहीं विदेशी बाजारों में इन बॉक्सों को “सस्टेनेबल पैकेजिंग” के रूप में सराहा जा रहा है। इससे साफ है कि पहाड़ की लोककला आधुनिक वैश्विक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला रही है।
महिलाओं की मेहनत, आत्मनिर्भरता की उड़ान
मुख्य विकास अधिकारी दिवेश शाशनी के अनुसार, जिलाधिकारी ऊधम सिंह नगर के निर्देशन में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को निरंतर रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। अल्मोड़ा की एक महिला उद्यमी द्वारा पश्मीना शाल की पैकेजिंग के लिए मूंज बॉक्स का ऑर्डर दिया जाना इसी प्रयास का परिणाम है।
ग्रामीण महिलाएं अब केवल कारीगर नहीं, बल्कि उद्यमी बन रही हैं। उनकी आमदनी बढ़ी है, परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और आत्मविश्वास के साथ वे स्वरोजगार की नई राह पर आगे बढ़ रही हैं।
आत्मनिर्भर पहाड़ की ओर मजबूत कदम
मूंज के बॉक्स में सजी पश्मीना शालें आज यह साबित कर रही हैं कि यदि स्थानीय संसाधन, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार को सही दिशा मिल जाए, तो पहाड़ों से भी वैश्विक ब्रांड खड़े किए जा सकते हैं।
यह पहल सिर्फ व्यापार की सफलता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत और आत्मनिर्भर पहाड़ की सोच को जमीन पर उतारने की एक सशक्त कहानी है—जहां हर बॉक्स के साथ महिलाओं की मेहनत, संस्कृति की खुशबू और प्रकृति के प्रति सम्मान दुनिया तक पहुंच रहा है।

