रुद्रपुर न्यूज़।(राजतंत्र टाइम्स) ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क या खोपड़ी के अंदर कोशिकाओं या ऊतकों की असामान्य वृद्धि को कहा जाता है, जो अनियंत्रित और असामान्य सेल डिवीजन के कारण विकसित होती है। यह ट्यूमर सीधे मस्तिष्क में उत्पन्न हो सकता है या शरीर के किसी अन्य हिस्से से फैलकर भी दिमाग तक पहुंच सकता है। ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित कर सकता है, जैसे ब्रेन टिश्यू, ब्लड वेसल्स, क्रेनियल नर्व्स, ब्रेन मेनिन्जीस, खोपड़ी, पिट्यूटरी ग्लैंड या पीनियल ग्लैंड।
मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के न्यूरोसर्जरी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. कपिल जैन ने बताया “ब्रेन ट्यूमर कई प्रकार के होते हैं। बेनाइन (गैर-कैंसरस) ट्यूमर कैंसर नहीं होते, लेकिन यदि ये मस्तिष्क के महत्वपूर्ण हिस्सों जैसे ब्लड वेसल्स, नर्व्स या ब्रेन स्टेम के पास हों, तो इनका सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक होता है। वहीं मैलिग्नेंट (कैंसरस) ट्यूमर अधिक गंभीर होते हैं, और यह समझना जरूरी होता है कि वे प्राथमिक हैं (यानी दिमाग में ही उत्पन्न हुए हैं) या शरीर के किसी अन्य हिस्से से फैलकर आए हैं। ट्यूमर का आकार, प्रकार और लोकेशन उपचार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मेटास्टेटिक ब्रेन ट्यूमर वह होता है, जो शरीर के अन्य अंगों जैसे फेफड़े, स्तन, किडनी, कोलन या मेलेनोमा से फैलकर मस्तिष्क तक पहुंचता है, और कई बार इसके लक्षण मूल कैंसर की पहचान से पहले ही सामने आ जाते हैं।
हालांकि प्राथमिक ब्रेन ट्यूमर के सटीक कारण स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन कुछ रिस्क फैक्टर्स पहचाने गए हैं। रेडिएशन के संपर्क में आना, जैसे बार-बार CT स्कैन, X-ray या रेडियोथेरेपी, ब्रेन ट्यूमर के जोखिम को बढ़ा सकता है। कुछ जेनेटिक बीमारियां भी इस जोखिम को बढ़ाती हैं। इसके अलावा HIV या AIDS से पीड़ित लोगों में कमजोर इम्यून सिस्टम के कारण ब्रेन ट्यूमर होने की संभावना अधिक होती है।
डॉ. कपिल ने आगे बताया “ब्रेन ट्यूमर के लक्षण उसके प्रकार और लोकेशन पर निर्भर करते हैं, और कई बार शुरुआती चरण में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। आम लक्षणों में बार-बार सिरदर्द होना, उल्टी के साथ सिरदर्द, दौरे (फिट्स), नजर से जुड़ी समस्याएं जैसे डबल विजन, धुंधला दिखना या दृष्टि कम होना, सुनने में कमी और चक्कर आना शामिल हैं। इसके अलावा शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवा, हाल ही में याददाश्त में कमी, व्यवहार में बदलाव, हाथ-पैरों में सुन्नता, पर्सनैलिटी में बदलाव, संतुलन और कोऑर्डिनेशन में समस्या, चेहरे में दर्द या असामान्य मूवमेंट जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं। ऐसे किसी भी लक्षण के दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना बेहद जरूरी है, खासकर किसी अच्छे न्यूरोलॉजिकल केयर सेंटर में।“
मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज में ब्रेन ट्यूमर के इलाज के लिए कई आधुनिक विकल्प उपलब्ध हैं। ट्यूमर की स्थिति के अनुसार आंशिक सर्जरी की जा सकती है ताकि न्यूरोलॉजिकल नुकसान का जोखिम कम रहे, जबकि कई मामलों में पूरी तरह से ट्यूमर निकालने का प्रयास किया जाता है। कुछ स्कल बेस ट्यूमर जैसे पिट्यूटरी एडेनोमा या क्लाइवस कॉर्डोमा को एंडोस्कोपिक सर्जरी से हटाया जा सकता है। गहराई में स्थित या एक से अधिक ट्यूमर के मामलों में स्टीरियोटैक्टिक बायोप्सी की जाती है।
मैलिग्नेंट ट्यूमर के इलाज में रेडिएशन थेरेपी का उपयोग किया जाता है, जिसमें एडवांस तकनीकों से आसपास के सामान्य टिश्यू को कम नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है। कीमोथेरेपी में विशेष दवाओं के जरिए कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। इसके अलावा स्टेरॉयड और सेरेब्रल डिकंजेस्टेंट दवाएं दिमाग की सूजन कम करने के लिए, एंटी-कन्वल्सेंट्स दौरे रोकने के लिए और दर्द निवारक दवाएं जरूरत के अनुसार दी जाती हैं। कुछ धीमी गति से बढ़ने वाले बेनाइन ट्यूमर में ‘वेट एंड वॉच’ अप्रोच अपनाई जाती है, जिसमें नियमित स्कैन के जरिए निगरानी रखी जाती है।
ब्रेन ट्यूमर के मामलों में समय पर पहचान और सही इलाज बेहद महत्वपूर्ण है। डायग्नोसिस के लिए न्यूरोलॉजिकल जांच, MRI और CT स्कैन किए जाते हैं, और कई बार प्री-ऑपरेटिव जांच की भी आवश्यकता होती है। इलाज में सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी और दवाओं का अकेले या संयोजन में उपयोग किया जा सकता है।
हालांकि सभी ब्रेन ट्यूमर को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ सावधानियां जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं। अनावश्यक रेडिएशन से बचना, कार्यस्थल पर सुरक्षा उपायों का पालन करना, परिवार में इतिहास होने पर जेनेटिक काउंसलिंग लेना और HIV या AIDS जैसी स्थितियों का सही प्रबंधन करना इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखने में सहायक होता है।

